कमी कहीं ज्यादा है, कहीं कम है| पर..कहीं कम है तभी तो कहीं ज्यादा है|
जिन्दगी का पहलु नज़रिए पर ही तो तय होता है| लेकिन कमी किसी भी कहानी का वह
हिस्सा है जो जितना हमें अखरता है ना, उतना ही नैसर्गिक भी है| आप चाहें तो,
बैलेंस-शीट का उधाहरण ले लीजिये| इसमें एक तरफ उधार है इसीलिए दूसरी तरफ
परिसंपत्तियां हैं| मतलब की एक सिरे पर जहाँ कमी है तो अगले ठीक अगले सिरे पर उसे
पूरा करने वाला पूरक|
मैं कहना बस इतना ही चाहता हूँ कि ऐ ज़िन्दगी तू ये सब जानती है| तू वो भी जानती
है| पर तेरी कमी के पीछे छिपे इस रहस्य की मैं भी समझ चूका हूँ| जिस तरह का कपडा
उसी तरह की चाल!! मैनी शायद आज एक बेहतर इंसान नहीं| पर कमी के साथ जीना कुछ
ज्यादा ही जैसे अब पसंद आ गया मुझे|कमी के साथ जीना शायद उतना सुखप्रद या मनोरंजक
हो ये तो ज़रूरी नहीं| लेकिन शायद इस कमी पर भरोसा करना बहुत आसान है| ये कमी कभी
आपको चलती भी नहीं| और चले भी तो कैसे| चल तो खुद ही बता रहा है कि मैं दुःख का
रूप स्वाभाविक रूप से रखता हूँ| मेरा तो स्वाभाव ही बुरा है, मुझसे अच्छे की
उम्मीद रख क्यूँ खुद बुरा बन रहे तुम!!

Comments
Post a Comment