आज फिर मैं और मेरी कलम साथ हैं, सोचा की चलो कुछ लिखते हैं, कुछ अपना कुछ खुदका खुदही से हाल-ए-बयान करते हैं।
ये ज़िन्दगी कीमती तो बहुत है मगर इसमे शायद वह जीवन रूपी रस महसूस अब नही होता। ऐसा नही है कि मैंने खोजने की कोशिश की नहीं पर शायद हर किसी के लिए हर एक वस्तु उपयुक्त और उपलब्ध हो ऐसा निश्चित नही है।
कई दिन बीत गए हैं। बाह्य चीजों में और खुद को काम मे व्यस्त रखकर बहुत कोशिश की कि मेरा मन थोड़ा विचलित हो जाये। थोड़ा इस मुद्दे से भटक जाए। पर यही तो जिंदगी है की जिससे आप भागने की कोशिश करते हैं वो आपके पीछे ही भगता रहता है और जिसकी तरफ भागने की कोशिश करते हैं बस वही सिरा सबसे जल्दी छूटता चला जाता है। और हम किसी भी परिस्थिति, मनःस्थिति से कब तक भाग सकते हैं? सामना तो करना ही है।
बात यहीं तक सीमित नही है। मैने यह भी समझ लिया है कि रिश्ते समझना, बनाना और निभाना हर किसी के बस की बात नही। खास कर के उन लोगों के बस से तो बहुत ही बाहर है जिन्हें लोग समझ ही नहीं आते।
में मानता हूं कि मुझे लोग अब जरा भी समझ नही आते या कहूँ की मुझे अपनी समझ पर ही शक हो चला है। चूंकि यूँ लोगों का करीब आना बात करना फिर खुद ही दूर चले जाना ये कैसे कोई समझ सकता है। जब जाना ही होता है तो आने की ज़रूरत भी क्या ही पड़ती है। मुझे तो वैसे भी अपने अकेलेपन का साथ बेहतर समझ आता है क्योंकि मेरे अकेलेपन में मुझसे कुछ छिपा नहीं है। मैं जानता हूं अपने एकल होने को।
समय और जीवन के साथ बढ़ते बढ़ते ये प्रतीत हो चला है कि अब मन शांत हो गया है। ना कोई भाव है ना किसी से खिन्नता। ना कोई खास अनुभूति की इच्छा ही बची हो जैसे!
सोचा बहुत.. कुछ खुशनुमा सा मन हो
फिर भी कहीं कहीं ये खोया रहता है
अब कम्भख्त को कौन बताए
सिर्फ डूबने से किनारे हाथ नही लगते!!
ऐसा नही की मैं जीवन से हार गया हूं मगर यह एक हिस्सा भी बार बार उठ खड़ा होता ही है। इससे जूझना बहुत कठिन नही है पर कई दफा आसान भी नही लगता।
कुछ सिरे पन्नो के यूँही सिलता हूँ
कि कभी कोई कहानी अपनी भी मिले
Comments
Post a Comment