जब आपका मन शांत होते हुए भी बेचैन होता है, दिन बीत तो जाते हैं पर काटना उन्हें आसान नही होता।
फिर इन बीते दिनों के बीच आप खुद को खोजते हो, ढूंढते हो कि कहां क्या खो गया है। क्यों आपका मन गुम और उदास-सा जान पड़ता है।आप बहुत मशक्कत करते हो, मेहनत करते हो अपने वर्तमान वातावरण को समझने, उसे अच्छे से देख पाने की। पर पता करना बहुत कठिन होता जाता है। जैसे आपके सवाल का जवाब आस पास हो ही ना।
एक कश्मकश सी अंदर ही अंदर आपके मन को विचलित किये जाती है और आपका मन लगातार ही व्याकुल होता रहता है।
पर क्या जवाब है? क्या किसी जवाब की ज़रूरत है भी? क्या ये बेचैनी, ये कुंठा सी अजब सी बहती हुई जज़्बाती धारा आपने खुद ही गढ़ी तो नही है।
कई बार खिड़की से बाहर देखने से या फिर खुले आसमान की असीमितता में खो जाने से कोई फायदा नही है ऐसे में। इससे मन को पाल भर के सुकून भले महसूस हो, आराम नही नसीब हो सकता।
इतने सवाल क्यों आखिर? इतनी बेबसी सी फिर से क्यों आखिर?
खोज रहा हूं, सोच रहा हूँ। इसी तलाश में हूँ कि किसी दिन शायद प्रतिउत्तर अपने आप स्वयं समीप आकर खड़ा हो जाये।
जो अंधेरा या उदासी है, जो फर्क न पड़ने की आदत से हो चली है, फिर शायद इसमें कुछ बदलाव आए।
कहते हैं जब ज़िन्दगी अजीब लगने लगे,
तो किसी उससे भी अजब इंसान की तलाश कीजिये
फिर कहीं ये परिदृश्य आप ही बदल जाये।
Comments
Post a Comment